एक काव्यात्मक गुस्ताखी

आपकी अमूल्य टिप्पणी का मुंतज़िर हूँ…

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बुझती हुई शमा का ज़रा दम तो देखिये
आप उसकी कोशिशों का वो परचम तो देखिये

अब ये कहाँ की बात के कमरे में बंद हो
निकल के आस पास का मौसम तो देखिये

ठीक के सुनती नहीं है आपको दिल की सदा
कुछ नहीं तो आँख ये पुरनम तो देखिये

 
भड़की हुई शमा का ज़रा दम संभालिये
अब आग बुझाने का ये परचम संभालिये

बुझ रहा है फ़िज़ाओं में ये रंगीनियों का जश्न
अब आप ही आके ज़रा मौसम संभालिये

दिल की सदा सुनाऊंगा महफ़िल में आज मै
आँख ना हो जाये ये पुरनम संभालिये

 

शम्मा की लौ से आज ज़रा दम समेट लूँ
उस ने उठा रखा है जो परचम समेट लूँ

आया हूँ तेरे शहर में, इतना तो मै करूँ
तेरी अदाओं से बना मौसम समेट लूँ

ठहरो अभी आओ नहीं मेरे करीब तुम
रुक जाओ ज़रा आँख ये पुरनम समेट लूँ

 

रोहित जैन
13-03-2008

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3 Comments Leave a comment.

  1. On April 7, 2008 at 6:41 pm neeraj1950 Said:

    रोहित जी
    क्या खूब प्रयोग किया है आपने…वाह.
    नीरज

  2. On April 7, 2008 at 8:41 pm MEET Said:

    बहुत अच्छा है भाई. वाह !

  3. On April 7, 2008 at 8:48 pm समीर लाल Said:

    बढ़िया है, बधाई.

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