न बोल
कोई बिकाऊ चीज तू ईमान को न बोल
बेकार ज़रा अपनी ही पहचान को न बोल
लब्ज़ों को पढ़ते हो समझ लो तो कोई मतलब
सिर्फ़ किताब गीता और क़ुरान को न बोल
वो तो है वफ़ादार् और अब इसको देखिये
जानवर ज़रा तू किसी भी इन्सान को न बोल
जो घर ये गिरा है तो क्यों मजबूत नहीं था
ख़तावार तू भी तो इस तूफ़ान को न बोल
लायेगा बरकत वो दुआओं से तेरे घर में
मुसीबत तू आनेवाले उस महमान को न बोल
घर वो है जहां पर हो मोहब्बत ही मोहब्बत
घर ईंट पत्थर के इस मकान को न बोल
जो तेरे दिल में भरी है वो महक आती है तुझको
खुश्बू का ख़तावार तू इस लोबान को न बोल
रोहित जैन
03-04-2008
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क्या लिखा है बंधु…
वाह… वाह
थोड़ी नैतिकता है पर सत्य भी है…।