उस इम्तिहान के पल में हम क्या कहें के झिझक गए

मेरे अश्क़ेनामुराद यूं, निगाह से थे छलक गए
चरागेदिल को बुझा गए, ये आज ऐसे चमक गए

हमें प्यास थी दीदार की, हो जाए झलक रुख़ेयार की
जिस पल गिरा उनका नक़ाब, उसी पल में पलकें झपक गए

मिलके भी तो हम ना मिले, थे दर्मियां कई फ़ासले
और वहशतेइश्क़ में, हम राह अपनी भटक गए

जो उन से मिली मेरी नज़र, उतरी बची सारी कसर
चले थे गुल की तलाश में, और ख़ार में हम अटक गए

शाखेज़हन की कली कली, महकी थी उसके ख़याल से
वो तस्सवुरेजाना किया, हम डाली डाली लचक गए

मुझे इश्क़ बेशुमार था, उसे भी कहां इनकार था
उस इम्तिहान के पल में हम क्या कहें के झिझक गए

रोहित जैन
31-03-2008

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4 Comments Leave a comment.

  1. On April 1, 2008 at 5:22 pm विनय प्रजापति Said:

    रोहित साहब बहुत बढ़िया, पर ‘ड़ाली’ नहीं ‘डाली’!

  2. On April 1, 2008 at 5:25 pm Rohit Jain Said:

    sahab typos hain….

    poori koshish karunga ke aaisi galtiyan dobara na ho

    tippani ke liye shukriya………

  3. On April 1, 2008 at 5:51 pm विनय प्रजापति Said:

    यार मज़ा तब आता है जब पढ़ने में निरन्तरता बनी रही, शब्द जो पढ़ते समय दिमाग़ में भुन-भुन करते रहें, 100% सटीक ग़ज़ल का मज़ा किरकिरा कर देते हैं, मैंने देखा है कि तुम उन लोगों में से हो जो कि सही जानते हैं और सही लिखते हैं… बिना किसी विधा की टाँग तोड़े… इसलिए तुम्हारी रचनाओं में मुझे perfection की उम्मीद रहती है…

    इस लिंक को देखना और कुछ कठिन शब्द सरलता से टाइप हो सकते हैं:
    http://likhohindi.googlepages.com/devshilp3.0.html

    किसी शेष सहायता के लिए मुझे ई-मेल कर लेना!

  4. On April 1, 2008 at 6:24 pm Rohit Jain Said:

    असल में हुज़ूर होता ये है कि office में जल्दबाज़ी में लिखने के कारण ऐसी गलतियां हो जाती हैं.
    पूरी कोशिश करूँगा कि भविष्य में इस तरह की गलतियां ना हों…

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