मेरे अश्क़ेनामुराद यूं, निगाह से थे छलक गए
चरागेदिल को बुझा गए, ये आज ऐसे चमक गए
हमें प्यास थी दीदार की, हो जाए झलक रुख़ेयार की
जिस पल गिरा उनका नक़ाब, उसी पल में पलकें झपक गए
मिलके भी तो हम ना मिले, थे दर्मियां कई फ़ासले
और वहशतेइश्क़ में, हम राह अपनी भटक गए
जो उन से मिली मेरी नज़र, उतरी बची सारी कसर
चले थे गुल की तलाश में, और ख़ार में हम अटक गए
शाखेज़हन की कली कली, महकी थी उसके ख़याल से
वो तस्सवुरेजाना किया, हम डाली डाली लचक गए
मुझे इश्क़ बेशुमार था, उसे भी कहां इनकार था
उस इम्तिहान के पल में हम क्या कहें के झिझक गए
रोहित जैन
31-03-2008
रोहित साहब बहुत बढ़िया, पर ‘ड़ाली’ नहीं ‘डाली’!
sahab typos hain….
poori koshish karunga ke aaisi galtiyan dobara na ho
tippani ke liye shukriya………
यार मज़ा तब आता है जब पढ़ने में निरन्तरता बनी रही, शब्द जो पढ़ते समय दिमाग़ में भुन-भुन करते रहें, 100% सटीक ग़ज़ल का मज़ा किरकिरा कर देते हैं, मैंने देखा है कि तुम उन लोगों में से हो जो कि सही जानते हैं और सही लिखते हैं… बिना किसी विधा की टाँग तोड़े… इसलिए तुम्हारी रचनाओं में मुझे perfection की उम्मीद रहती है…
इस लिंक को देखना और कुछ कठिन शब्द सरलता से टाइप हो सकते हैं:
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असल में हुज़ूर होता ये है कि office में जल्दबाज़ी में लिखने के कारण ऐसी गलतियां हो जाती हैं.
पूरी कोशिश करूँगा कि भविष्य में इस तरह की गलतियां ना हों…