क्यों सब की ज़ुबाँ पे शिकायत का रंग है
इन्सान की ये कौन सी आदत का रंग है
लड़ते हो ख़ुदाओं के मज़हबों की नाम पर
ना जाने कौन सी ये इबादत का रंग है
अब नहीं ड़रता मै के अंजाम क्या होगा
हर शय में आजकल क़यामत का रंग है
बच्चों की बात में भी वो मासूमियत कहाँ
उन पे भी चढ़ा अब तो नफ़ासत का रंग है
क्यों सोचते हो मुल्क़ के हालात के बारे
तुम्हारी ही चुनी हुई सियासत का रंग है
पहले मै था कैसा और अब क्या हो गया
खुद से करी थी जो उस बगावत का रंग है
रोहित जैन
12/11/2006
bahut badhia
wakai lajwab