छोटी बहर में एक प्रयोग करने की गुस्ताख़ी की है
आपकी अमूल्य टिप्पणी का मुंतज़िर हूँ….
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आपकी याद आई
चाँदनी मुस्कुराई
कहीं पर जला दिल
मोहब्बत थरथराई
हवा ये शोख़ पुरनम
तेरी खुशबू ले आई
बुझी थी लौ ग़मों की
सेहर जब जगमगाई
फ़िर इक उम्मीद जागी
तेरी आवाज़ आई
तेरा चेहरा जो देखा
मेरी आँखें भर आई
कहीं पर खो गया दिन
लो फ़िर से रात आई
जो करते थे मोहब्बत
उन्ही ने चोट खाई
मुझे मारा खुदा ने
कहाँ पर दूँ दुहाई
जुदाई है तिलिस्मी
क़यामत साथ लाई
गरीबों से तो पूछो
क्या होती है ख़ुदाई
वो जब भी पास आये
तिशनगी कसमसाई
रोहित जैन
26/07/2007
rohit… prayog saarthak hai, kintu ‘fir’ nahiin ‘phir’ hota hai… kripaya bhashha par dhyaan dein… to mazaa 100% rahta hai!
chandani muskurai awesome,hume bahar ka gyan nahi,gazal lajawab hai.
बहुत अच्छा लिखा है।