जुदा

हर ज़ुबाँ से आता हुआ अल्फ़ाज़ जुदा है
सब ही की रवायतों का अंदाज़ जुदा है

मुफ़लिसी हर आँख में किसी ना किसी शय की
अपनी तरह से हर कोई मोहताज जुदा है

मूर्ती भी सजी है मय्यत भी ज़ुल्फ़ भी
फूलों का रंग एक है परवाज़ जुदा है

थे हाथ कभी जोड़ते अब सर पे चढ़े हैं
है शख़्स तो वो ही बस आवाज़ जुदा है

खुशी में भी आते हैं और ग़म में भी यारों
हैं अश्क़ सब की आँख में आग़ाज़ जुदा है

रोहित जैन
12/11/2006

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  1. थे हाथ कभी जोड़ते अब सर पे चढ़े हैं
    है शख़्स तो वो ही बस आवाज़ जुदा है

    gr8…


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