देख तो

कैसा सजा है आज ये बाज़ार देख तो
इन्सान ही इन्सां का खरीदार देख तो

कैसा लगा है आज ये दरबार देख तो
मुंसिफ़ ही क़ातिलों में है शुमार देख तो

हर शख़्स ही यहां ज़ेरेदीवार देख तो
सूरज की रोशनी से ये क़रार देख तो

ये तमाशा-ए-जहान यार देख तो
चराग से जलती है अब दीवार देख तो

जिस शख़्स को धोखा मिला हर बार देख तो
वो फिर भी कर रहा है ऐतबार देख तो

आँखों के चारसूं का ये ग़ुबार देख तो
क्या फिर से जल गई है ये बहार देख तो

अब हश्र से होने लगा है प्यार देख तो
ये रूह बिखरने को है तैयार देख तो
रोहित जैन
09-03-2008

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2 Comments Leave a comment.

  1. On March 10, 2008 at 12:14 pm limit Said:

    अब हश्र से होने लगा है प्यार देख तो
    ये रूह बिखरने को है तैयार देख तो
    ” what a wonderful words, liked it”

  2. On March 10, 2008 at 12:50 pm R P Singh Said:

    इंसानी खरीद तो पुराने जमाने में भी थी पर आज तो शरीर के अंग चोरी से निकाल कर बेचे जाते हैं एडवांस जो हो गये हम

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