दुख के चेहरे पर लकीरें याद की

दुख के चेहरे पर लकीरें याद की
सुन रहा हूं सदा दिलेबरबाद की

तेरी महफ़िल तेरा परचम ओ’ हुजूम
अब किसे है फ़िक़्र इस नाशाद की

तूने जीते जी ही मारा है मुझे
अब ज़रूरत ही नहीं जल्लाद की

क्यों न टूटूं क्यों न रो’ऊं ये बता
इन्सान हूँ, मूरत नहीं फ़ौलाद की

है तबियत ये के खुद मिट जायेंगे
क्या ज़रूरत है किसी की याद की

मुझसे बोला अब ज़माने से न बोल
और ना तौहीन कर फ़रियाद की

जो क़रम होता नहीं तो ना सही
हमको भी आदत नहीं है दाद की

सोचता हूं के परों को तोड़ना
आपकी फ़ितरत है या सैय्याद की

हर तरह से तोड़ के देखा ये दिल
है ज़रूरत अब नई ईजाद की

पूरी महफ़िल ही ग़मों में चूर है
क्या करें कोशिश अब इसकी शाद की

क्या इमारत क्या मकां क्या झोंपड़ा
तोड़ दी बुनियाद हर बुनियाद की
रोहित जैन
28-02-2008

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5 Comments Leave a comment.

  1. On February 28, 2008 at 3:59 pm limit Said:

    तूने जीते जी ही मारा है मुझे
    अब ज़रूरत ही नहीं जल्लाद की

    क्यों न टूटूं क्यों न रो’ऊं ये बता
    इन्सान हूँ, मूरत नहीं फ़ौलाद की

    ” beautiful words, just heart touching ya’

    Regards

  2. On February 28, 2008 at 4:13 pm विनय प्रजापति Said:

    माशा अल्लाह!

  3. On February 28, 2008 at 5:40 pm Rohit Said:

    kasam se bahut achi kavita, heart touching

  4. On February 28, 2008 at 10:48 pm mehek Said:

    bahut hi sundar

  5. On March 1, 2008 at 12:34 pm Rekha Said:

    your poetry is touch to heart.

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