सब्र हम यूँ इख़्तियार करते हैं

सब्र हम यूँ इख़्तियार करते हैं
होता नहीं है बेक़ार करते हैं

हमको मालूम है वो है बेवफ़ा
फिर भी हम ऐतबार करते हैं

जिसको अपनी ही कोई ख़बर नहीं
उसी का हम इंतज़ार करते हैं

कभी टिकते ही नहीं हैं ये जज़्बे
ज़िंदगी रहगुज़ार करते हैं

जिसने हर बार हमे तक़लीफ़ ही दी
भूल वो ही बार बार करते हैं

बस सोचते ही रह जाते हैं हम
पर नहीं इख़्तियार करते हैं

इनके होते कुछ दिखता ही नहीं
अश्क़ आँखों में गुबार करते हैं

उनको ज़रूरत ही क्या है तीरों की
वो नज़र से ही शिक़ार करते हैं

जब सबने सुने किस्से अंजाम के हैं
लोग क्यों फिर भी प्यार करते हैं

जब सभी के दिल परेशां हैं यहां
चलो हम भी बेक़रार करते हैं

सब जानते हैं क्या मिलेगा वहां
फिर भी नहीं होशियार करते हैं

गर आज कोई नहीं है फ़ना होने को
ख़ुद को हम उम्मीदवार करते हैं

जो भुला नहीं पाते अपना माज़ी
हर बात पे ये आशक़ार करते हैं

आओ आज ख़ुद ही क़त्ल होते हैं
आओ ख़ुद ही को मज़ार करते हैं

एक हम ही नहीं उनपे मर मिटनेवाले
ये काम तो सौ-हज़ार करते हैं

एक नज़र देख लीजिये हमको भी
ख़ुद को हम बादाख़्वार करते हैं

कोई तो बता दो के कहें कैसे
के हम भी तो उनको प्यार करते हैं

जिस लब्ज़ में ना ज़िक़्र हो उन का
उस लब्ज़ को हम नागवार करते हैं

रोहित जैन
25-02-2008

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  1. bahut badhiya,unko teer ki jarurat nahi,nazron se shikar karte hai wah.


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