निगाहों के आसपास

कुछ ख्वाब सजा रखे हैं निगाहों के आसपास
कुछ गुल खिला रखे हैं निगाहों के आसपास

तू मुत्तसिल हो तो ही तो बन पाये आशियां
कुछ तिनके जला रखे हैं निगाहों के आसपास

ड़रते भी हैं के खोलें ना खोलें इस आँख को
कुछ धोखे भी खा रखे हैं निगाहों के आसपास

तुझे देखकर झुकतीं है तो तू गलत ना समझ
कुछ लब्ज़-ए-दुआ रखे हैं निगाहों के आसपास

रोहित जैन
21-02-2008

The URI to TrackBack this entry is: http://rohitler.wordpress.com/2008/02/25/%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b8/trackback/

RSS feed for comments on this post.

Leave a Comment