ज़िन्दगी के मोड़ पर आके है ठहरी तिशनगी
साँस टुकड़ा अश्क़ धज्जी और गहरी तिशनगी
तन्हाइयां भी साथ हैं साथ है उम्मीद भी
कितनी सियाह और कितनी है सुनहरी तिशनगी
तिशनगी बेवा भी है तिशनगी है शोख़ भी
एक पल में ही उदासी और रुपहरी तिशनगी
प्यास कितनी पास है और दूर कितना नूर है
तिशनगी का तोड़ है बस और गहरी तिशनगी
नक़्श-ए-माज़ी भी यही और मुस्तकबिल भी है
रोशनी की छाँव है और रात ठहरी तिशनगी
हुस्न-ओ-इश्क़ ज़ख़्म-ओ-इबादत कोई शय छूटी नहीं
जिस जिन्स भी देखोगी बस है एक गहरी तिशनगी
याद के कंकर लगे और ज़ेहन के टुकड़े हुए
ज़र्रा ज़र्रा बिखरी मेरी इफ़्तार-ओ-सहरी तिशनगी
रोहित जैन
13/06/2007