ज़िंदगी लम्हों में सिमट जायेगी
ऱूह टुकड़ों में जो बँट जायेगी
आज फ़िर तन्हाई साथ लायी उन्हे
आज फ़िर नींद उचट जायेगी
अब तुम आ ही गये खयालों में
रात उदासी में ही कट जायेगी
शाम आई चमक उठी यादें
तन्हाई सीने से लिपट जायेगी
ज़रा आके तोड़ ही दो दिल को
धुंध ये इश्क़ की छट जायेगी
आज भी दिल को इक उम्मीद सी है
लेखनी किस्मत की पलट जायेगी
इतनी हल्की नहीं है चोट मेरी
के बस मरहम से ही घट जायेगी
तुम भी मुझको कोई बद्दुआ दे दो
मौत दो पल को तो हट जायेगी
नहीं मालूम था उसे बचाने में
कश्ती मेरी ही उलट जायेगी
रोहित जैन
06/07/2007