ग़म-ए-हस्ती को कोई अज़गार मिल जाये
ग़म-ए-हस्ती को कोई अज़गार मिल जाये
और कुछ नहीं कोई इन्तेज़ार मिल जाये
ज़िंदगी साहिलों पर अटकी हुई है
अब मुझे कोई मझधार मिल जाये
शरीफ़ों की बस्ती में दिल नहीं लगता
सच्चा अब कोई गुनहगार मिल जाये
ये खाली दीवारें अच्छी नहीं लगतीं
लगाने को कोई इश्तेहार मिल जाये
सिर्फ़ खुशियां ही बिकतीं हैं यहाँ
ग़म-ए-दिल का कोई बाज़ार मिल जाये
दोस्तों की वफ़ा तो देख ली मैने
ढ़ूँढ़ता हूँ कोई गद्दार मिल जाये
रोहित जैन
02/02/2007
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