क़तरा क़तरा पिघल रहा हूँ
तेरी आँच में मै जल रहा हूँ
सहमा सहमा और धीरे धीरे
बर्फ़ की मानिंद गल रहा हूँ
अब चलना सीखा है थोड़ा थोड़ा
लगी थी ठोकर, संभल रहा हूँ
तू साथ आये तो बात क्या हो
अभी तो तन्हा ही चल रहा हूँ
है कुछ ख़ला सा है कुछ कमी सी
खुली ज़ुल्फ़ जैसा मचल रहा हूँ
ना मै मुजस्सिम, ना मै मुकम्मिल
अधूरे साँचे में ढ़ल रहा हूँ
अभी तो सारा जहाँ देख्ना है
अभी तो घर से निकल रहा हूँ
जाने क्या मुझसे ख़ता हुई है
सभी की आँखों में ख़ल रहा हूँ
जो वक़्त के पन्नों में दब गई थी
मै वो अधूरी ग़ज़ल रहा हूँ
क्या मेरी हस्ती क्या शख़्सियत है
ना आज हूँ मै ना कल रहा हूँ
रोहित जैन
29/01/2007