हुस्न पर हर पल नये जमाल रहते हैं
चेहरे पे हर मिजाज़ के विसाल रहते हैं
मिलने की आरज़ू में और मिलने के बाद भी
हर हाल में हम जानेजाँ बेहाल रहते हैं
कह दूँ मै हाल-ए-दिल तुझे, या नहीं कहूँ
हर पल मेरे ज़ेहन में ये सवाल रहते हैं
तेरे सामने आते ही बस खो सा जाता हूँ
ना ख़्वाब रहते हैं न फिर खयाल रहते हैं
पीछे जो देखता हूँ बस कोहरा ही है नज़र
याद मुझको बस वो ही कुछ साल रहते हैं
रोहित जैन
01/03/2007