हाथ कुछ आया नहीं बेरुखी के सिवा
वो और कुछ नहीं था एक अजनबी के सिवा
ना जफ़ाएं ना तक़ाज़े ना बेरुखी ना दगा
हमको कुछ नहीं आता है दोस्ती के सिवा
हर कदम पर नयी मंज़िलें आईं नज़र
जहाँ में कुछ ना बचा आवारगी के सिवा
कभी यार कभी प्यार कभी खुदापरस्त
सब बन के रह गया एक आदमी के सिवा
जानकर आगाह नहीं हम तदबीर-ए-सैयाद से
लेकर वो जायेगा भी क्या ज़िन्दगी के सिवा
सूरज भी इतना दूर है के दिया लगता है
कोई चीज़ दिखती नहीं तिशनगी के सिवा
रोहित जैन
07/03/2007