सच शय है वो जिसको कभी बोला नहीं जाता
अपनी ही क़ब्र को कभी खोला नहीं जाता
क्या रंग सियासत ने दिया है जहान को
बन्दों को गिना जाता है तोला नहीं जाता
किसके लहू का रंग है दामन पे बता दे
जो लाख धोने पर मेरे मौला नहीं जाता
जहां मुल्क के बंदे हैं गुलामी पे रज़ामंद
वहां उनको भड़काने कोई शोला नहीं जाता
अब वो भी जानता है कुछ हो नहीं सकता
अब लेके सहर आग का गोला नहीं जाता
रोहित जैन
10-10-2007