वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है
वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है
बन के लकीर हर इक, हाथों में आ बसा है
वो मिले थे इत्तेफ़ाक़न हम हंसे थे इत्तेफ़ाक़न
अब यूं हुआ के सावन आँखों में आ बसा है
काफ़ी थे चंद लम्हे तेरे साथ के सितमगर
ये क्या किया है तूने ख़्वाबों में आ बसा है
अब तो वो ही है साहिल, तूफ़ान भी वो ही है
कुछ इस तरह से दिल की मौजों में आ बसा है
उम्मीद-ओ-हौंसला भी रिश्ता भी है ख़ला भी
वो ज़िंदगी के सारे नामों में आ बसा है
कुछ रफ़्ता रफ़्ता आता, मुझको पता तो चलता
वो शख़्स एक दम ही आहों में आ बसा है
उस की पहुंच गज़ब है, वो देखो किस तरह से
दिन में भी आ बसा है रातों में आ बसा है
क्या बोलता हूं जाने, के पूछती है दुनिया
वो कौन है जो तेरी बातों में आ बसा है
रोहित जैन
08-02-2008
The URI to TrackBack this entry is: http://rohitler.wordpress.com/2008/02/20/%e0%a4%b5%e0%a5%8b-%e0%a4%b6%e0%a5%99%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%a7%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%a7%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%ae/trackback/