वो नहीं क़ातिल ये तो खंजर की ख़ता थी
वो कहाँ बदले मेरी नज़र की ख़ता थी
उस ही की दीवारें ज़रा मजबूत नहीं थीं
आंधी में जो गिरा तो ये उस घर की ख़ता थी
कटना ही था इसे यही दस्तूर-ए-जहां है
ये क्यों नहीं झुका ये तो इस सर की ख़ता थी
वो क़ैस है तो क्या हुआ है जुर्म मोहब्बत
आके लगे उसे तो ना पत्थर की ख़ता थी
इतना जो हरा था तो ये जुर्रत थी उसी की
जो है गिरा कट के तो ये शजर की ख़ता थी
रोहित जैन
08/10/2007