रात सूनी सूनी है और सहर खामोश है
तुम चले गये तो सारा शहर खामोश है
कैसा तन्हा है समाँ ताज़ीर-ए-खामोशी मुहीब
दिल धड़कता था कभी अब मगर खामोश है
उम्र भर वो साथ थे पर नहीं समझे मुझे
मेरी नज़र में इल्तिमास उनकी नज़र खामोश है
वक़्त है आतिश-मिजाज़ और रोना है मना
बर्क़ दिखती है मगर उसका असर खामोश है
ना दोस्ती ना वफ़ा ना उम्मीद-ओ-हौसला यहाँ
ज़िन्दगी है कारवाँ पर किस क़दर खामोश है
लाओ तुम्हारे हाथ का पत्थर तराश दूँ ज़रा
तासीर बढ़ा दूँ अभी धार-ए-हजर खामोश है
बुझा है वो ही चिराग जिसमें लौ-ए-ज़ीश्त थी
उसी पे आ के ज़र्ब पड़ा जो शजर खामोश है
बात यूँ तो करी उसने ज़माने की हुज़ूर
पर जाने क्या हुआ मेरे नाम पर खामोश है
रोहित जैन
07/02/2007
सहर = Dawn
ताज़ीर = Punishmant
मुहीब = Dreadful
इल्तिमास = Request / Appeal
आतिश-मिजाज़ = Having the temprament of fire
बर्क़ = Lightning
तासीर = Effect
धार-ए-हजर = Sharpness of the stone
लौ-ए-ज़ीश्त = Flame of Life
ज़र्ब = Injury
शजर = Tree