मोहब्बत नये पर लगाकर उड़ा दी

मोहब्बत नये पर लगाकर उड़ा दी
मेरी ख़ाक जुगनू बनाकर उड़ा दी

अंधेरे की कालिख तो रहने दो मुझ पर
चाँदनी तो तुमने बुझाकर उड़ा दी

गुल ख़ार तक चमन ढ़क गया है
मेरी ज़िंदगी यूँ जलाकर उड़ा दी

यही एक भरम तो बचा था सितमगर
मेरी दास्ताँ भी सुनाकर उड़ा दी

लगाई है मुझ पर मोहब्बत की तोहमत
मेरी बंदगी सर झुकाकर उड़ा दी

रोहित जैन
11/03/2007

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