मेरी ज़िंदगी में सहारा नहीं है

मेरी ज़िंदगी में सहारा नहीं है
किस किस को मैने पुकारा नहीं है

निकलता हूँ घर से तो ये सोचता हूँ
वो क्या कर्ज़ है जो उतारा नहीं है

हर इक अपने साहिल पे पहुँचा हुआ है
कश्ती को मेरी ही किनारा नहीं है

सभी खुश हैं लेकिन मुझे बोलते हैं
तू ही इस जहां में बेचारा नहीं है

मोहब्बत में मेरी कमी होगी शायद
कोई दोष शायद तुम्हारा नहीं है

किस दर पे जाऊं कहाँ सर झुकाऊं
किस किस ख़ुदा को उतारा नहीं है

जो मरते हैं पल पल ज़रा उनसे पूछो
मौत कहते हैं यूँ तो दोबारा नहीं है

रोहित जैन
12-01-2008

The URI to TrackBack this entry is: http://rohitler.wordpress.com/2008/02/20/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a5%9b%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80/trackback/

RSS feed for comments on this post.

2 Comments Leave a comment.

  1. निकलता हूँ घर से तो ये सोचता हूँ
    वो क्या कर्ज़ है जो उतारा नहीं है

    बढ़िया शे’र ….

  2. Your potery is touch to heart very nice .


Leave a Comment