मेरी ज़िंदगी में सहारा नहीं है
किस किस को मैने पुकारा नहीं है
निकलता हूँ घर से तो ये सोचता हूँ
वो क्या कर्ज़ है जो उतारा नहीं है
हर इक अपने साहिल पे पहुँचा हुआ है
कश्ती को मेरी ही किनारा नहीं है
सभी खुश हैं लेकिन मुझे बोलते हैं
तू ही इस जहां में बेचारा नहीं है
मोहब्बत में मेरी कमी होगी शायद
कोई दोष शायद तुम्हारा नहीं है
किस दर पे जाऊं कहाँ सर झुकाऊं
किस किस ख़ुदा को उतारा नहीं है
जो मरते हैं पल पल ज़रा उनसे पूछो
मौत कहते हैं यूँ तो दोबारा नहीं है
रोहित जैन
12-01-2008
निकलता हूँ घर से तो ये सोचता हूँ
वो क्या कर्ज़ है जो उतारा नहीं है
बढ़िया शे’र ….
Your potery is touch to heart very nice .