मुझसे भी रकीबों की तरह बात ना करो

मुझसे भी रकीबों की तरह बात ना करो
मेरी ही बाज़ी में मुझे तुम मात ना करो

इक बार तो कह दो मुझे तुम अपना हालेदिल
मुझे क़त्ल इन्तेज़ार में दिन रात ना करो

ये खुल के शरमाना भी भला कैसी अदा है
ज़ुल्मोसितम पर ही गुज़र-औकात ना करो

आँखों में तेरा अक्स है ख़वाबों में तेरा रू
दिन को भी सितम और सितम रात ना करो

हमको जो मिला है वो तुम्ही से तो मिला है
अब तुम ही हमें भूलने की बात ना करो

हम कुछ नहीं कहते तो फिर ऐसा तो नहीं है
तुम भी कभी हम से कोई भी बात ना करो

मजबूर हैं हम और मोहब्बत भी बहुत है
अब और बुरे तुम मेरे हालात ना करो

रोहित जैन
15-01-2008

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