बिखरे हुए से फूलों में तूफ़ान की खुशबू आई है
इक गद्दार ग़रेबां से ईमान की खुशबू आई है
हमने ये ना जाना था के वो कितना अन्जाना था
गीली सी उन आँखों से पहचान की खुशबू आई है
हैरां दिल की वादी है बिखरी हुई सी चाँदी है
भीगी हुई फ़िज़ाओं से ये चाँद की खुशबू आई है
दिल धड़का आँखें बहकी ख्वाबों की दुनिया महकी
उजड़े हुए से जंगल में इन्सान की खुशबू आई है
तू मेरा है मै तेरा हूँ अब इस से ज्यादा क्या बोलूँ
आज यहां इक मंदिर से आज़ान की खुशबू आई है
रोहित जैन
24/09/2007
अच्छी शायरी है।