प्यार का आखरी अंदाज़ बाकी है

प्यार का आखरी अंदाज़ बाकी है
दिल तोड़ने का रिवाज़ बाकी है

मौत के फ़रिश्तों ज़रा कुछ पल ठहरो
मेरे आखरी नमाज़ बाकी है

चुरा ली उन्होने आज फ़िर आँखें
अब भी थोड़ा लिहाज़ बाकी है

जाने क्यों ख़ला सा लगता है
जाने क्या आगाज़ बाकी है

सबकी बातों को सुन लिया मैने
बस उसकी ही आवाज़ बाकी है

समा लेता हूँ ग़मों को सीने में
समंदर सा मिजाज़ बाकी है

अज़गार-ए-खून-ए-जिगर ही है अब तक
और भी हुस्न-ए-नाज़ बाकी है

दो-चार दिन और निकल जायेंगे
घर में थोड़ा अनाज़ बाकी है

कुछ सर आज भी ढके से दिखे
कहीं शर्म-ओ-लिहाज़ बाकी है

रोहित जैन
07/01/2007

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One Comment Leave a comment.

  1. सबकी बातों को सुन लिया मैने
    बस उसकी ही आवाज़ बाकी है…

    ‘हाँ’ का इन्तिज़ार है या ‘न’ का दर्द… बहुत ख़ूब…


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