नज़्म – इसी जगह

नज़्म – इसी जगह

याद है हम तुम मिले थे उस दिन इसी जगह
मै खड़ा था दूर और तुम थी मेरी जगह
अटका था दिल जब आँख से आँखें मिलीं थीं उफ़!
बस तू ही तू दिखती थी फिर मुझको सभी जगह
बीता वो पल और रास्ते बदले जहान के
हो जिस्म कहीं पर भी, पर है दिल उसी जगह
अब भी है दिल को आस, इक उम्मीद है रवां
इक बार फिर मिल जाये तू मुझको किसी जगह
समझाया दिल को लाख तू किस्मत नहीं मेरी
दिल की भी पर है ज़िद न हो कोई तेरी जगह
वैसे तो मेरा दिल नहीं कमज़ोर, क्या कहूं
मोहब्बत का लगा तीर है दिल पर बुरी जगह

रोहित जैन
19/09/2007

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