ना मंज़िलें न रास्ते न हमसफ़र है कोई

ना मंज़िलें न रास्ते न हमसफ़र है कोई
बोलो इस से बड़ा किसी का सफ़र है कोई

जिस सिम्त भी देखूँ नज़र आता है कोई और ही
देखो आईना यहाँ क़द के बराबर है कोई

कश्ती हर बदन की ड़ूबती मिट्टी में है
ये ज़मीं है रब के या फ़िर समंदर है कोई

कैसा वीरां है ये दिल कोई आहट ही नहीं
दुनिया ही है आस पास या मुर्दाघर है कोई

अरमां के पेड़ सारे यहाँ हिज्र में झड़ते गये
ना ही अब फ़ल हैं कहीं ना ही पत्थर है कोई

दिल की मीनारों पे पंछी आज आया कौन ये
इसकी ना ही कूक है ना देह पर पर है कोई

घोंटी किस ताबीर ने आज मेरी साँस ये
है ये ज़ंजीर-ए-वफ़ा या के ज़ेवर है कोई

कुछ अजब सी धड़कनें आज बहकी सी हैं क्यों
खलिश है कोई कहीं या के फ़िर ड़र है कोई

इश्क़ का क्या पूछिये वजूद तक मिलता नहीं
टूटा हुआ एक दिल जहाँ में इस क़दर है कोई

कैसे फ़ैले हैं यहाँ नाखूनों के ये निशां
रोता हुआ इस मोड़ पर रहा रात भर है कोई

कौन आवाज़ें यहाँ देता है दिल को आज ये
दिखता नहीं है आँख को, कहीं मगर है कोई

जो हुआ वो ख़्वाब सा लगता है दिल को आज भी
जागता रहता है फ़िर भी नींद में बिस्तर कोई

खुद को ढ़ूँढ़ूं या तुझे या मै खोजूं इश्क़ को
या ख़ुदा तू ही बता ये भी मुक़द्दर है कोई

रोहित जैन
21/08/2007

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