दिल लगा बहार में, हाथ में आई खिज़ां

दिल लगा बहार में, हाथ में आई खिज़ां
इश्क़-ए-ख़ुदा की आस थी हो गया इश्क़-ए-बुतां

इक वक़्त था के हर तरफ़ अपना ही वुजूद थ
हाया इश्क़ क्या किया मिट गये नाम-ओ-निशां

उफ़ वो जलवे हुस्न के उफ़ वो साये ज़ुल्फ़ के
मुँह में ज़ुबां होते हुए भी हो गये हम बेज़ुबां

जो आज मेरे पास है वो कल जुदा हो जायेंगे
इश्क़ की ये रीत है, है इश्क़ का ये इम्तिहां

हाय वो कुछ इस तरह तसव्वुर में थे बेहिजाब
लाख़ कह लें एक थे हम, था ज़माना दर्मियां

रूठकर बैठे हैं वो, कब तक रहेंगे रूठकर
तू सब्र कर दिल देखना होंगे कभी वो मेहरबां

इश्क़ कर के देख ले खो जायेगी सब मुफ़लिसी
होगी तेरी फ़िर ये ज़मीं होगा तेरा ही आसमां

रोहित जैन
15-10-2007

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