दिल के तलबखाने में आज कैसी शकेबाई सी है
कोई साज़ नहीं है कानों में शहनाई सी है
हाय तमाशा क्या लगा है मेरे दिल के आस पास
सुरूर-ए-कैफ़ की बारिश है और तन्हाई सी है
आँखों में इक जुस्तजू है ज़ेहन में मेरे तलाश
आरज़ू थोड़ी ड़री है थोड़ी घबराई सी है
ये क्या जलवा-ए-इश्क़ है क्या है ये उन की अदा
कर के निगाह-ए-करम अब वो शरमाई सी है
वो थी शबनम इश्क़ की या शरारा था कोई
जला के भी जिस ने मुझे राहत ही पहुँचाई सी है
लौट आये हैं जो वापिस तो ये लगता है हमें
जैसे मंज़िल इश्क़ की खुद ही ठुकराई सी है
मान लेता हूँ के उस को इश्क़ से तौबा सही
ज़ुल्फ़ उस ने बेवजह फ़िर क्यों उलझाई सी है
बैठे बैठे क्यों गुमां हो रहा है आज ये
चार-जानिब से घटायें इश्क़ की छाई सी है
साक़ी-ए-मदहोश की महफ़िल का सितम कैसा है
वो नशा बन के मेरी रगेजां में समाई सी है
जब कभी देखा इसे तो ये ही मैने पाया है
ज़ीस्त के औराब पर यादों की रोशनाई सी है
चराग-ए-सोज़-ए-ग़म ‘रोहित‘ बुझ ना जाये कहीं
इस नूर से ही ज़िंदगी मैने ये सजाई सी है
रोहित जैन
01-02-2008
शकेबाई = Peace