जो हो चुका वो कभी इंतेहा नहीं होता

हर तराशा हुआ बुत ख़ुदा नहीं होता
हर आँख में दिल का आईना नहीं होता

रही होंगी शायद कोई मजबूरियां उसकी
वो छोड़ के जाने से बेवफ़ा नहीं होता

दिल टूटना इत्तेफ़ाक़ भी तो हो सकता है
हर इत्तेफ़ाक़ ज़िंदगी में हादसा नहीं होता

ऐसा तो नहीं तुम में कोई ऐब नहीं
तुम्हारे कह देने से कोई बुरा नहीं होता

ये तरीका है, हम को आज़माता है वो
ग़म मिलने से वो कभी नाख़ुदा नहीं होता

किनारे पर रहना आसां है बहुत
हर ड़ूबनेवाले का तमाशा नहीं होता

उस में तुम ने भी कुछ किया होगा
हर ग़म नसीब का लिखा नहीं होता

रखो उम्मीद और ढ़ूँढ़ लो मंज़िल
हौंसले हों तो कुछ लापता नहीं होता

आज दुश्मन है तो इस से फ़र्क़ ही क्या
जो कल दोस्त था वो कभी बुरा नहीं होता

वक़्त खींच लाये जाने किस सिम्त
जो हो चुका वो कभी इंतेहा नहीं होता

रोहित जैन
12-09-2007

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