जब से मैने वो हँसी सा पैकर देखा है

जब से मैने वो हँसी सा पैकर देखा है
झूमता गाता हुआ हर मंज़र देख है

राह में मिलनेवालों से लेते हैं अपनी ही खबर
भूले अपना घर जब से उसका घर देख है

फूलों में भी अब देखो इक नई सी रंगत आई है
बागों ने भी शायद रूप-समंदर देखा है

इश्क़ में चैन जो पाया हमने और कहीं नहीं पाया
वरना हमने भी मस्जिद और मंदर देखा है

सच ही कहती है दुनिया के इश्क़ में नींद नहीं आती
हमने भी वो रातजगे का मंज़र देखा है

जिनकी बात सुना करते थे हम हर इक अफ़साने में
हमने भी उन एहसासों को छूकर देखा है

रोहित जैन
10-01-2008

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  1. This is a great poem Rohit. It’s like its speaking about genuine feeling.


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