काटे हैं इन्सान ने दिल की रगों से खंजर कई
काटे हैं इन्सान ने दिल की रगों से खंजर कई
दिल की हिम्मत से सुनो झुक जाते हैं लश्कर कई
ये जो मतलबी जहान है, ये फ़ितरत-ए-इन्सान है
पेड़ पर लगते ही फल धर लेते हैं पत्थर कई
तू ड़रा सा क्यों खड़ा है देख तेरे आस पास
बेख़ौफ़ और बेफ़िक्र लेते मौत से टक्कर कई
मौत के सैलाब में बह जाता है सब खुश्क-ओ-तर
इस शय से हारे हैं यहाँ औरंग-ओ-जाबर कई
इन्सान तो इन्सान अब तो मुर्दों की भी हालत ये है
नोचते हैं हर लाश को इन्सान भी आकर कई
रोहित जैन
29-01-2008
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