कमज़ोर मै नहीं हूँ जंगों का दिल नहीं है
देखा नहीं है जाता हारा हुआ ज़माना
रखता है लाज देखो गुमराहियों की मौला
मंज़िल उसी की आता है भटका हुआ ज़माना
आँखें हैं मेरी नादां दिल भी है थोड़ा गाफ़िल
दिखता नहीं है इनको बदला हुआ ज़माना
आँखों में क़तरा क़तरा आती हैं तेरी यादें
दिल से नहीं है जाता गुज़रा हुआ ज़माना
दो-चार अश्क़ हरदम रखना संभाल कर तुम
कहकर नहीं है आता बिगड़ा हुआ ज़माना
तहज़ीब-ए-ग़म है यारों होता यही है आया
हर राह पर मिलता है हँसता हुआ ज़माना
मिट्टी के घर की कोई कीमत नहीं जहां में
मुझ तक नहीं है आता नाज़ां हुआ ज़माना
नफ़रत बड़ी ग़ज़ब है इक पल में फ़ैलती है
ज़िक्र-ए-मोहब्बतों पर बहरा हुआ ज़माना
रोहित जैन
20/05/2007
नाज़ां = इतराया