एक पल में ही हज़ारों मुद्दतों की बात हो
एक पल में ही हज़ारों मुद्दतों की बात हो
ज़हन में जो ले रहीं उन करवटों की बात हो
आओ बोलें प्यार के इख़लास के कुछ लब्ज़ हम
ये कहां की बात के बस नफ़रतों की बात हो
इक नया ही चाँद लाकर अब उजाला हम करें
अब नई सी, बस नई सी हसरतों की बात हो
कुछ दिये टूटे हैं तो क्या कुछ नये जल जायेंगे
कब तक उन टूटे दियों की क़िस्मतों की बात हो
अब हिमालय से नई गंगा निकालें तो मज़ा
कब तक उन सदियों पुरानी आदतों की बात हो
जो लगी है आग बुझना उसका मुश्किल तो नहीं
गर ज़हन में ड़र ना हो बस हिम्मतों की बात हो
क्या हुआ सबको के कोई भी नज़र उठती नहीं
अब नज़र में और जिगर में शिद्दतों की बात हो
कब तक उन महलों के ही बारे में होगी गुफ़्तगू
कुछ हमारी और तुम्हारी दिक्कतों की बात हो
रोहित जैन
17-02-2008
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क्या बात है मियाँ, सही जा रहे हैं… अगर आपने यह सभी ग़ज़ल ख़ुद लिखी तो ख़ूब लिखी हैं…