उसे प्यार करने में मै अपना घर जला बैठा
खुद अपने ही सीने पे एक नश्तर चला बैठा
हर बार सोचता था बदलूंगा आप को
हर बार उसी भूल का खंजर चला बैठा
जब भी जताया हक़, हक़ से मै जल गया
एक बार नहीं हाथ मै अक़्सर जला बैठा
जिस राह पर ठोकर लगी उस राह पर वापस
जाकर मै सोचता हूँ क्यों इस पर भला बैठा
समझा जो किसी और का मेरा ही अक्स था
अपने ही आईने पे मै पत्थर चला बैठा
रोहित जैन
01/03/2007
उसे प्यार करने में मै अपना घर जला बैठा
खुद अपने ही सीने पे एक नश्तर चला बैठा
जितना कहूँ कम होगा… कमाल का शे’र है… वाह-वाह…