उसकी गली में यारों आज उससे सामना है
कहीं हाथ से ना जाये इस जाँ को थामन है
पहले तो इस जहाँ ने हँसना बनाया मुश्किल
रोने भी अब ना देंगे के ये भी तो अब मना है
किसको बताऊँ मुजरिम किस पर करूँ मुकदमा
हर हाथ में है खंजर जो खून से सना है
अश्क़ों की झील में ये कश्ती मेरी फ़ँसी है
मेरे ग़म की वादियों में कोहरा बड़ा घना है
रोहित जैन
09/03/2007