इश्क़ हर इक का हल नहीं होता
मसला हर इक सरल नहीं होता
तुझको देखा तो फिर यकीं आया
फूल हर इक कँवल नहीं होता
दिल जो टूटा है तो मलाल नहीं
प्यार हर इक सफ़ल नहीं होता
देखो चिलमन में रोशनी है वहां
वीरां हर इक महल नहीं होता
हाय अब भी सवाल बाकी हैं
मुद्दा हर इक तो हल नहीं होता
नुख़्स होते हैं हर एक शय में
ज़ुल्फ़ हर इक में बल नहीं होता
सोचता हूं कभी कभी रुककर
तन्ज़ हर इक दखल नहीं होता
आज ठोकर लगी तो सीख गया
पाँव हर इक पहल नहीं होता
दिल से निकलें तभी मुनव्वर हैं
लब्ज़ हर इक ग़ज़ल नहीं होता
रोहित जैन
03/09/2007