आज भी थोड़ा सा पढ़ के छोड़ दिया है
ज़िंदगी का एक और सफ़हा मोड़ दिया है
आज फिर सोचा के चुन लूँ ख़ार कुछ नये
आज फिर ड़ाली को छू के छोड़ दिया है
अब वो नहीं आते हैं ना आवाज़ आती है
उस आखरी उम्मीद को भी छोड़ दिया है
आखरी लम्हे में भी बस मुस्कुराहट का जवाब
हर बात को फिर से अधूरा छोड़ दिया है
जुस्तजू खोए हुओं की उम्र भर रक्खी
एक रेत का घर था जिसे अब तोड़ दिया है
जिस्म के नेज़े पे रख दी आरज़ू-ए-ज़िंदगी
और फिर मुझको भटकता छोड़ दिया है
रोहित जैन
31/08/2007