आओ कुछ ख़ामोशी सुन लो
लब्ज़ों में सन्नाटे बुन लो
बिखर रहे हैं अक्स के टुकड़े
टुकड़ों में ख़ामोशी चुन लो
अश्क़ों से अफ़साने लिख दो
कुछ अपने बेगाने लिख दो
कुछ कह दो भीगी आँखों से
बूँदों में ख़ामोशी चुन लो
ख़्वाबों को सिरहाने रख दो
चाँद के कुछ पैमाने रख दो
कुछ रेशे यादों के चुनकर
आहों से ख़ामोशी बुन लो
कुछ बेबस से नग़मे कह दो
दिल में हैं जो सदमे कह दो
कुछ बिखरे बिखरे पन्नों में
बिखरी सी ख़ामोशी सुन लो
कुछ सौंधी यादों की मट्टी
कुछ भूले वादों की मट्टी
माटी के दिल माटी के इन्साँ
इन सब की खामोशी सुन लो
रोहित जैन
30/08/2007