अश्क़ गिनता है मेरे आज मुनाफ़े की तरह

अश्क़ गिनता है मेरे आज मुनाफ़े की तरह
ज़िंदगी आँखों से गुज़रती है जनाज़े की तरह

आज वो ही दर मुझे लगता है बुतखाने सा
कभी करता था इबादत जहां काबे की तरह

जिससे मरासिम थे कभी दिल-ओ-जाँ की तरह
वो शख़्स देखे है मुझे आज तकाज़े की तरह

जिसने रक्खा था कभी मुझको बनाकर धड़कन
उस ने फेंका है मुझे पुराने लिफ़ाफ़े की तरह

कैसे जलवे हैं तेरे ये कैसी ख़ुदाई है तेरी
मेरी मैय्यत है सजी इक खूबसूरत शै की तरह

रोहित जैन
07-09-2007

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