एक ख़ास दोस्त के लिये…

एक पुराने दोस्त की बहुत याद आ रही थी ज़िंदगी ने जिससे जुदा कर दिया है…
तो दिल के ख़यालों को ग़ज़ल में लिख दिया…

आप सब के साथ बाँट रहा हूँ, दुआओं में याद रखियेगा…

तू कभी बिछड़ा नहीं और तू मिला भी नहीं
पर मुझे तुझसे कोई शिकवा नहीं ग़िला भी नहीं

तू भले मुझसे ख़फ़ा है और तू दूर भी है
मगर तुझसे ऐ दोस्त दिल को फ़ासिला भी नहीं

मै कैसे दिखलाऊं तुझको दिल की सच्चाई
एक अरसे से तू मुझसे गले मिला भी नहीं

वो एक वक़्त था जब दिल से दिल मिले थे यहाँ
ये एक वक़्त है बातों का सिलसिला भी नहीं

तू मुझे कुछ समझ, मुझको तो तुझसे प्यार है दोस्त
तुझ सा कोई ढ़ूंढ़ा नहीं मिला भी नहीं

मुझे पता है मुझ में लाख कमी है शायद
ये बेरुख़ी मगर दोस्ती का सिला भी नहीं

कभी कभी मुझे लगता है भूल जाऊं तुझे
मगर ये सच है भूलने का हौंसिला भी नहीं

तू खुश रहे ये दुआ तेरी कसम रोज़ करता हूँ
और अपने ग़म का मुझे अब कोई ग़िला भी नहीं

बस इक उम्मीद है तुझ को गले लगाऊं कभी
के वो एहसास मुझे फ़िर कहीं मिला भी नहीं

रोहित जैन
07-05-2009

Published in: on June 27, 2009 at 2:26 pm Comments (4)

वो आग ऐसी दिल में लगा के चला गया

उनका ख़याल आया और आ के चला गया
यादों का एक पल ही रुला के चला गया

जिस शख़्स से उम्मीद थी फूलों की वही शख़्स
राहों में मेरी ख़ार बिछा के चला गया

सपनों का इक जहान बसाया था जिसके साथ
दुनिया वही ग़मों की बसा के चला गया

शम्मा जलाई जिसके इन्तज़ार में वही
शम्मा से मेरा घर ही जला के चला गया

भूले से भी जिसको न भूलने की कसम थी
वो आज हमको खुद ही भुला के चला गया

‘रोहित’ से किसी तौर जो बुझती नहीं है दोस्त
वो आग ऐसी दिल में लगा के चला गया

रोहित जैन
11-06-2009

Published in: on June 12, 2009 at 12:16 am Comments (3)

तुमने बना दिया है मोहब्बत में क्या मुझे

तुमने बना दिया है मोहब्बत में क्या मुझे
के घूर घूर देखता है ये जहां मुझे

आँखों में अश्क़ दिल पे सलीबों के घाव हैं
मैने किया था प्यार और ये क्या मिला मुझे

साक़ी ने तो दिया था मुझे कह के जामेइश्क़
ये क्या के मेरा ही लहू इसमें मिला मुझे

अब खुद पे इख्तियार है न दिल पे इख्तियार
दीवाना मोहब्बत ने ऐसा कर दिया मुझे

गुल की तलाश में मुझे बस ख़ार ही मिले
उट्ठी जहां नज़र तो इक सेहरा मिला मुझे

ग़मे-आरज़ू कहूं इसे या आरज़ू-ए-ग़म
ये क्या है जिसका बार उठाना पड़ा मुझे

जिस दिन से मिल गई नज़र उसकी नज़र के साथ
उस दिन से नहीं मिल रहा अपना पता मुझे

ख़ता है मोहब्बत तो ख़ता ये क़बूल है
मै किसका गुनहग़ार हूँ हाँ है पता मुझे

तौबा के उसकी याद को दिल से मिटाऊं मै
‘रोहित’ समझ लिया है क्या इतना बुरा मुझे

रोहित जैन
14-05-2009

बार == Weight

Published in: on May 24, 2009 at 10:47 am Comments (6)

चाँद से मेरी बातें होती रहीं

दिलकश मेरी रातें होती रहीं
चाँद से मेरी बातें होती रहीं

जिस तरह मिल रहे हैं ज़मीं आसमां
उस तरह मुलाक़ातें होती रहीं

उसकी ज़ुल्फ़ें सँवारें मेरी उँगलियां
ऐसी करामातें होती रहीं

शरमाते रहे दिल मिलाते रहे
ऐसी शुरुआतें होती रहीं

गले लग गये प्यार से, रो दिये
इश्क़ की बरसातें होती रहीं

बसाया ‘रोहित’ ने जहां उनके साथ
रुसवा कायनातें होती रहीं

रोहित जैन
25-03-2009

Published in: on April 6, 2009 at 9:57 am Comments (3)

कब जाने मोहब्बत में ये मक़ाम आ गया

कब जाने मोहब्बत में ये मक़ाम आ गया
बजाय ख़ुदा लब पे तेरा नाम आ गया

इसको अदा कहूँ के ये एहसान है तेरा
तर्क़े वफ़ा के बाद भी सलाम आ गया

अब कम से कम उसको मेरे मिलने का ड़र नहीं
मर के ही सही मै किसी के काम आ गया

सोचा था सुबह अब नहीं जाना है उसकी ओर
लो फिर से वहीं लेके अपनी शाम आ गया

हर बार जब मुझको लगा के भूल गया हूँ
जाने कहाँ से यक-ब-यक क़लाम आ गया

जब भी कभी मुझको तेरी यादों ने बुलाया
दिल हाथ में लेके तेरा ग़ुलाम आ गया

‘रोहित’ को भेजते हैं वो नामा-ए-शौक़े इश्क़
लगता है मुझे मौत का पयाम आ गया

रोहित जैन
31-03-2009

बजाय == In place of
तर्क़े वफ़ा == End of love
यक-ब-यक == Suddenly
नामा-ए-शौक़े इश्क़ == Love Letter

Published in: on April 1, 2009 at 9:38 am Comments (2)

हालात-ए-मुल्क़

आँख में आँसू भरे हैं दिल में ये जज़्बात हैं
क्यों मेरे प्यारे वतन के दुख भरे हालात हैं

कोई कुछ करता नहीं है कोई कुछ कहता नहीं
क्यों ये सन्नाटा निहां है ये भी कोई बात है

भीख माँगें औरतें बच्चे सड़क पर सो रहे
क्या यही जमहूरियत की मुल्क़ को सौग़ात है

सीने छलनी हैं ज़मीं के फ़िज़ा लहूलूहान है
आसमानों से मुसलसल खून की बरसात है

जल रही हैं बस्तियां ड़ूबी हुई हैं कश्तियां
जिस तरफ़ देखो यहां फ़ैले हुए ज़ुल्मात हैं

ज़िन्दा लाशें चल रही हैं और सुलगते हैं बदन
कौन बोलेगा यहां ये आदमी की जात है

आदमीयत ज़ुल्म की चक्की में पिसती जा रही
अपनी खबर मिलती नहीं दुनिया की क्या औक़ात है

जिस तरफ़ देखो गुनहगारों की महफ़िल है जमा
आह मौसीक़ी बनी है अश्क़ के नग़मात हैं

इक अंधेरा सा उतरता है दिलों तक आँख से
अब सहर होती नहीं है सिर्फ़ छाई रात है

झोंपड़ों गलियों बियाबानों में दरियाओं में खून
पुरसुकूं दैरो हरम तक में यही हालात हैं

खून से रंगीं फ़िज़ाएं खून-बू लाती हवा
सुर्ख़ नदियां हैं यहां पर सुर्ख़ हर निशात है

खून उबलेगा नहीं तो खून टपकेगा तेरा
अब तो यल्ग़ारे बगावत से ही बननी बात है

किस कदर बेशर्म बैठे हैं ये सारे आदमी
क्या दिले ‘रोहित’ में ही बस ऐसे एहसासात हैं

रोहित जैन
06-03-2009

Published in: on March 19, 2009 at 7:26 pm Comments (2)

इश्क़ हमको मिला तो बनके इश्तिहार मिला

इश्क़ हमको मिला तो बनके इश्तिहार मिला
नुमाइशों से भरा आपका किरदार मिला

हर एक शख़्स यहां हमको बेक़रार मिला
हर एक आँख में खुशियों का इन्तेज़ार मिला

यूँ तो दुनिया में बहुत लोग मिले थे हमको
जिसे भी ढ़ूँढ़ना चाहा वो ही फ़रार मिला

कोई आवाज़ सुनाई तो दे रही थी हमें
मगर उठाई नज़र तो फ़क़त ग़ुबार मिला

हर एक शख़्स तड़पता हुआ मिला हमको
हर एक सिम्त हमें ग़म का कारोबार मिला

मै उसको कैसे अपना हालेदिल बयां करता
बेइख़्तियार मिला मुझको जितनी बार मिला

इसे क़िस्मत कहूँ या ज़िंदगी का खेल कहूँ
हर एक राह का पत्थर हमें मज़ार मिला

किसी शराब में तासीर वो नहीं पाई
ग़मेदुनिया में जो प्यारे हमें ख़ुमार मिला

किसी को वास्ता नहीं है किसी से भी यहाँ
हर एक शख़्स यहां मुझको रहगुज़ार मिला

के जैसे बू छुपी हुई हो फूल में ‘रोहित’
हर एक राख में सोया हुआ शरार मिला

रोहित जैन
12-03-2009

Published in: on March 13, 2009 at 6:42 pm Comments (7)

बात बेबात याद करते हैं

बात बेबात याद करते हैं
भूलकर ज़ात याद करते हैं

अश्क़ आँखों के रुक नहीं पाते
लेके बरसात याद करते हैं

तेरे मिलने की दुआ है हरपल
जोड़कर हाथ याद करते हैं

दुश्मनी नींद से हुई अपनी
तुझको हर रात याद करते हैं

मेरे काँधे पे जब तेरा सर था
वो मुलाक़ात याद करते हैं

उसी इख़लासोमोहब्बत की कसम
वही जज़्बात याद करते हैं

हाल ‘रोहित’ का क्या बतायें हम
तुझको दिन-रात याद करते हैं

रोहित जैन
04-03-2009

Published in: on March 6, 2009 at 9:45 pm Comments (2)

मेरे ख़ुदा इसे किसी काबिल बनाइये

मेरे ख़ुदा इसे किसी काबिल बनाइये
कुछ ग़म इसे भी दीजिये और दिल बनाइये

कब तक मुग़ालते में रहूँ नाख़ुदा के मै
साहिल को मौज, मौज को साहिल बनाइये

ये इम्तिहां भी देखिये मैने किया है पार
कुछ और मेरी ज़ीस्त को मुश्किल बनाइये

ये बर्क़ मेरे घर को जला ही नहीं सकी
इसकी तपिश को मेरे मुक़ाबिल बनाइये

ये क्या के चार बूँद गिरी हैं ज़मीन पर
खन्जर को आप देखिये क़ातिल बनाइये

कब तक मै सरेराह भटकता रहूँ ख़ुदा
कोई तो मेरी राह में मन्ज़िल बनाइये

शामिल मेरी रुसवाई में सारा शहर यहाँ
एकाध शख़्स दिल में भी शामिल बनाइये

जब तक जिया वो कोई जशन कर नहीं सका
मय्यत को ही ‘रोहित’ की अब महफ़िल बनाइये

11-02-2009
रोहित जैन

Published in: on March 4, 2009 at 7:35 pm Comments (2)

ग़मों ने बाँट लिया मुझको ख़ज़ाने की तरह

ग़मों ने बाँट लिया मुझको ख़ज़ाने की तरह
बिखर गया हूँ हर गली में फ़साने की तरह

मुझे कुछ इस तरह से ढ़ूँढ़ रही है गर्दिश
के जैसे मै हूँ शिकारी के निशाने की तरह

के रात रात न हो, कोई चिता हो जैसे
के जैसे ख़्वाब हों जलने के बहाने की तरह

मै कोई संग न था मै तो एक शीशा था
पटक दिया मुझे पत्थर पे ज़माने की तरह

ये वहम ये ख़लिश ये वफ़ा-मिजाज़ ज़ेहन
इन्होने कर दिया ‘रोहित’ को दीवाने की तरह

रोहित जैन
16-01-2009

Published in: on February 28, 2009 at 11:43 am Comments (14)