सुना है अफ़साना

इशरत का सुना है अफ़साना हैरत का सुना है अफ़साना
चाँद सितारों से तेरी सूरत का सुना है अफ़साना

लोगों ने सुने हैं वाइज़ से किताबी क़यामत के किस्से
हमने तेरी निगाहों की राहत का सुना है अफ़साना

तू घबराई तू शरमाई जो हमको तकते देख लिया
आँखों ने जो कर दी उस जुर्रत का सुना है अफ़साना

ख़ारों से गुल्ज़ारों का और खिज़ा से खिली बहारों का
दोज़ख के वाशिंदों से जन्नत का सुना है अफ़साना

नींदों में मीठे ख्वाबों का और साँसों के सैलाबों का
दिल में होनेवाली हर आहट का सुना है अफ़साना

वो लैला लैला करता था वो मजनू मजनू कहती थी
हम ने भी उन दोनों की उल्फ़त का सुना है अफ़साना

संग-सफ़ेद का टुकड़ा वो पैमान-ए-मोहब्बत है यारों
ताज-ए-मोहब्बत की हमने तुरबत का सुना है अफ़साना

रोहित जैन
16-01-2008

तुरबत = Tomb

ना मंदिरों में पायेगा ना मस्जिदों में पायेगा

ना मंदिरों में पायेगा ना मस्जिदों में पायेगा
ढ़ूंढ़ना है जो ख़ुदा तो ग़मज़दों में पायेगा

जब उस ख़ुदा ने अर्श को और फ़र्श को बांटा नहीं
फिर चैन कैसे आदमी इन सरहदों में पायेगा

घर में जाके देख तो बच्चे हैं कुछ भूखे वहां
य़े बता दे फिर खुशी क्या मैकदों में पायेगा

ना ही किसी की भीख से ना रहम से रख वास्ता
जो भी तुझको चाहिये वो मक़सदों में पायेगा

ढ़ूंढ़ता जिसको है तू वो ज़ुल्फ़ के बस में नहीं
छांव तुझको चाहिये तो बरगदों में पायेगा

आसमां छूना है तो फैला के पर उड़ जा अभी
पाना है तुझको मंज़िलें तो ना हदों में पायेगा

जो यहीं बिखरा हुआ है तेरे मेरे आस पास
वो ही किताबों में वो ही तू बुतकदों में पायेगा

जो दफ़्न है अंदर उसे ना भूलना प्यारे कभी
दम हुआ जो नींव में तो गुम्बदों में पायेगा

रोहित जैन
01-10-2007

हो गए इम्तिहान बहुत

देखे हैं इन्सान बहुत
सब ही हैं हैरान बहुत

ऐ ख़ुदा अब बस भी कर दे
हो गए इम्तिहान बहुत

कुछ रातें अब भूखी होंगी
आए हैं महमान बहुत

सच कहना कितना मुश्क़िल था
लगता था आसान बहुत

जाने कैसे कर गुज़रा सब
मै भी हूं हैरान बहुत

सब ग़म उनसे ही मिलते हैं
जिनसे हो पहचान बहुत

बस कहने की बातें हैं ये
के देखे हैं तूफ़ान बहुत

तुम भी कुछ ग़म दे सकते हो
अब भी बाकी है जान बहुत

‘रोहित’ थका अभी से है तू
अभी दूर है आसमान बहुत

रोहित जैन
30-04-2008

रास्तों पे सब ही पहचाने से लोग हैं

रास्तों पे सब ही पहचाने से लोग हैं
देखो करीब से तो अंजाने से लोग हैं

दिल में झांकोगे तो बस तन्हाईयां ही हैं
महफ़िल सजी है फिर भी वीराने से लोग हैं

करते हैं इश्क़ जानकर अंजाम इश्क़ का
नासमझ से लोग दीवाने से लोग हैं

जिसका वजूद ही नहीं, है उस से मोहब्बत
शम्मा नहीं है फिर भी परवाने से लोग हैं

हैं अश्क़ आह दर्द ही तन्ख्वाह इश्क़ की
छलके गिरे टूटे से पैमाने से लोग हैं

दिखता हो चाहे जो, है कुछ और मुख़्तसर
अपनी हक़ीक़तों के अफ़साने से लोग हैं

हर एक बिक रहा है ज़रूरत के भाव से
अस्ल में देखो तो चाराने से लोग हैं

टूटे हुए छूटे हुए लम्हों का जोड़ हैं
टुकड़ों में जोड़े बिखरे काशाने से लोग हैं

हर एक शय नशा है हर एक शय जुनूं
ज़िदगी साक़ी है मैख़ाने से लोग हैं

आज भी रोते हैं इक छोटी सी बात पर
बदले से ज़माने में पुराने से लोग हैं

छूते हैं आसमां और मिट्टी में पाँव हैं
महल की दीवारों में तहखाने से लोग हैं

अब आप ही समझाइये ये राज़-ए-ज़िंदगी
बाकी जहां में सब ही बचकाने से लोग हैं

रोहित जैन
02/09/2007

आज तक उन खुशबुओं का सिलसिला तोड़ा नहीं

आज तक उन खुशबुओं का सिलसिला तोड़ा नहीं
दिल अपना जलाया मगर उसका दिल तोड़ा नहीं

तुम भी देके देख लो, ग़म से मै ड़रता नहीं
जैसी भी रही ज़िंदगी मुँह कभी मोड़ा नहीं

रात कि महफ़िल सजी थी, चाँद का गिलास था
ग़म पिये तो क्या हुआ पर वो मज़ा छोड़ा नहीं

ये भी क्या सवाल है के इश्क़ कितना चाहिये
दिल तो बच्चे की तरह है, सब मिले थोड़ा नहीं

ये इश्क़ का तूफ़ान है, कोई सलामत ना रहा
जानता था मै भी ये पर नाव को मोड़ा नहीं

अब तो ‘रोहित’ को बताओ अस्ल में लिक्खा था क्या
आज तक समझा नहीं, पुर्ज़ों को भी जोड़ा नहीं

रोहित जैन
24-04-2008

शौक़ है

सुबह सुबह कुछ ख़याल आये ज़हन में तो लब्ज़ों ने ढ़ाल दिये….
ग़ज़ल लिखने की कोशिश की किंतु अधिक समय नहीं दे पाया इसलिये काफी unmetered है….. माफ़ीगुज़ार हूँ इसके लिये….

 
उन्हे पर कतरने का शौक़ है
यहाँ हवाओं से लड़ने का शौक़ है

रखो ये नफ़ासत अपने पास तुम
हमें तितलियां पकड़ने का शौक़ है

लोग ड़रते हैं ड़रें गिरने से यहाँ
हमें आसमां परखने का शौक़ है

लाख पहरे बिठा लो कुछ होगा नहीं
खुशबुओं को बिखरने का शौक़ है

वो लगे हैं हमको गिराने में सब
हमें तो आगे बढ़ने का शौक़ है

अंधेरों उजालों में उलझे हैं सब
हमें रंग भरने का शौक़ है

ये दिये ना बुझेंगे हवाओं से अब
हर हाल इन्हे जलने का शौक़ है

उन्हे शौक़ है महलों में बसें
हमें दिल में बसने का शौक़ है

 

रोहित जैन
24-04-2008

खींच लाएगी

ज़िंदगी पास खींच लाएगी
इक न इक आस खींच लाएगी

तुझे भी एक दिन इस कुँए तक
तेरी ही प्यास खींच लाएगी

दुआ दिल की कबूल जब होगी
मरते में साँस खींच लाएगी

हालात की तल्ख़ी देखना तुझको
ख़ुदा के पास खींच लाएगी

मेरी याद तुझे मुझ तक
करके उदास खींच लाएगी

मेरी मोहब्बत आवाज़ जब देगी
तुझे बदहवास खींच लाएगी

चमन तक तुझे भी इक दिन
गुलों की बास खींच लाएगी

‘रोहित’ की ग़ज़ल तक तुझको
बात कुछ खास खींच लाएगी
रोहित जैन
23-04-2008

अहलेमोहब्बत

कोई हमें भाता नहीं उस मेहरबां को छोड़कर
और कुछ मिलता नहीं उससे फ़ुगां को छोड़कर

अपनी अपनी है तमन्ना अपनी अपनी है दुआ
चुन लिया हमने उसे सारे जहां को छोड़कर

ऐसा नहीं कोई भी छत कोई भी दर हासिल नहीं
हमको जाना ही नहीं उसके मकां को छोड़कर

ये ख़लिश कैसी जगी है है ये कैसी आरज़ू 
और कुछ बाकी नहीं दिलेनातवां को छोड़कर

क्या लिखें ख़त में तुझे क्या कहें लब खोलकर
कोई ज़बां आती नहीं दिल की ज़बां को छोड़कर

है ‘रोहित’ अहलेमोहब्बत कोई शक़ इसमें नहीं
मर के जाएगा कहां इस आस्तां को छोड़कर
रोहित जैन
21-04-2008

 

फ़ुगां = Cry of Pain

दिलेनातवां = Weak Heart

आज तक जो भी हुआ प्रस्तावना है

आपको अब भी बहुत कुछ देखना है
आज तक जो भी हुआ प्रस्तावना है

चाँद तक जाने की राहें खोज लीं
दिल से दिल की राह किसको ढ़ूंढ़ना है

अब भी तुमको आस है क्या बात है
तुम भी पागल हो यही संभावना है

तुम शराफ़त से कराओगे ये काम
ये तो नियमों की कड़ी अवमानना है

टूट कर बिखरोगे अड़ियल ना बनो
जानते भी हो के किससे सामना है

लो नये नेताजी आते हैं यहाँ
हाथ में वादों का उनके झुनझुना है

कुछ तो सोचो कुछ विचारो यार तुम
अम्न-ए-आलम ये भी कोई कामना है

आप भी निकलें ज़रा ख़्वाबों से अब
आप का घर भी हवाओं में बना है

मै यूँ ही दहलीज़ पे बैठा हूं अब
क्या बला है ये सहर ये देखना है

 

रोहित जैन
18-04-2008

और नहीं

मरने की दुआ दे दो हमको जीने का तमाशा और नहीं
इस रंज मुसीबत ग़म से भरी दुनिया की तमन्ना और नहीं

साहिल पे अड़े तूफ़ानों के सहता हूं थपेड़े मुद्दत से
अब हार गया हूं दुनिया से कश्ती ये शिकस्ता और नहीं

अश्क़ गिराये थे हमने के दिल की आग बुझायेंगे
आग नई इन अश्क़ों से हर बार लगाना और नहीं

दुनिया समझी है हमको और हम भी समझ गए दुनिया
अब दानिशमंदी कहती है के दुनिया दुनिया और नहीं

दिल के टुकड़ों को हौले से अब जोड़ा है, समझाया है
अब ग़म तो क्या ज़िक्रेग़म भी इस दिल को गंवारा और नहीं

था चाक जिगर मोहताजेरफ़ू मुश्किल से छुपे हैं छेद सभी
अब ठानी है हमने दिल में ये शौकेबहारां और नहीं

हम क़त्ल हुए हैं पहले ही इक बार नहीं सौ बार यहां
अश्क़ों की ज़बां से आती उन आहों का इशारा और नहीं

आहें देखीं रुसवाई भी अश्क़ों से भरी तन्हाई भी
सब देख चुका हूं दुनिया में इक और नज़ारा और नहीं

उस दिन के लिये ‘रोहित’ सह ली ज़ुल्मत सारी इस दुनिया की
जो होना हो अब हो जाये, अब ख़ौफ़-ए-ख़ुदाया और नहीं
रोहित जैन
16-04-2008