वो बहुत याद आए भुलाने के बाद

वो बहुत याद आए भुलाने के बाद
आग बुझती नहीं है ज़माने के बाद

और इस से बड़ी कोई मुश्किल नहीं
ज़िंदगी बढ़ गई ज़हर खाने के बाद

इतना अंधा किया फ़ुरक़ते यार ने
दिल जलाना पड़ा उसके जाने के बाद

हुआ हाल ऐसा मेरा हिज्र में
होश आया है अब घर जलाने के बाद

आईने से निगाहें मिला ना सका
ख़ुद अपना ख़ुलूस आज़माने के बाद

ज़ख़्मे दिल और दागे जिगर मिल गए
तुम्हे दोस्त अपना बनाने के बाद

हमने सोचा के मै से सुकून आएगा
आग और बढ़ गई ये बुझाने के बाद

खून कितने पतंगों का होता है उफ़!
मेरी क़ब्रे शम्मा जलाने के बाद

क्या कहे तुम से ‘रोहित’, बताए वो क्या
कैसा लगता है यूं मौत आने के बाद

रोहित जैन
24-09-2009

बदले बदले

जारी हैं क़त्ल अब भी बस सर हैं बदले बदले
हैं आज भी वो क़ातिल खंजर हैं बदले बदले

इल्ज़ाम हैं लगाते के हम हैं बदले बदले
दिल से ज़रा ये पूछो क्यूंकर हैं बदले बदले

अब प्यार भी नहीं है ना ऐतबार बाकी
शख़्स तो वो ही हैं तेवर हैं बदले बदले

रुकता नहीं है कोई किसी हादसे के कारण
शक्ल पर ना जाओ अंदर हैं बदले बदले

साक़ी है हमसे हैरां या औकात गिर गई है
ये जाम तो ना बदला, सागर हैं बदले बदले

अब ना रही वो चिलमन वो जिससे झाँकते थे
बस रास्ता वो ही है पर घर हैं बदले बदले

हम जिनकी मुश्किलों से मुश्किल में पड़ गये थे
वो हमको मुश्किलों में पाकर हैं बदले बदले

वो शख़्स तो कभी का मंज़िलों में गुम है
हम ही बचे हैं जिसके मंज़र हैं बदले बदले

आज मै दीवारों से बात कर रहा हूँ
तन्हा खड़ा हूँ यारों सब दर हैं बदले बदले

रोहित जैन
04-10-2007

किसने बोला क़ज़ा से ड़रते हैं

किसने बोला क़ज़ा से ड़रते हैं
हम तो तेरी वफ़ा से ड़रते हैं

दुश्मनों का तो हम को ड़र ही नहीं
दोस्तों की दुआ से ड़रते हैं

इश्क़ होने का हमको ख़ौफ़ नहीं
हम तो बस इंतेहा से ड़रते हैं

किसी इन्सान से घबराएं क्यों
वो के जो बस ख़ुदा से ड़रते हैं

आप से प्यार है हमें मंज़ूर
के इज़हारे वफ़ा से ड़रते हैं

ये बीमारी ही हमको बेहतर है
चाराग़र की दवा से ड़रते हैं

जिनको अपनी छतों पे हो न यकीं
वो ही काली घटा से ड़रते हैं

यूं तो दम है जिगर में ‘रोहित’ के
फिर भी उस बावफ़ा से ड़रते हैं

रोहित जैन
07-08-09

यूँ इश्क़ का हमने दिया है इम्तिहां अक़्सर

यूँ इश्क़ का हमने दिया है इम्तिहां अक़्सर
मुँह में ज़ुबां होते हुए थे बेज़ुबां अक़्सर

इश्क़ की तासीर ये समझा नहीं कोई
इश्क़ में मिट जाते हैं नाम-ओ-निशां अक़्सर

अश्क़ बिखर जाते हैं बरसात का पानी बनकर
खुशी के पल बन जाते हैं दर्द-ओ-फ़ुगां अक़्सर

इश्क़ की नीली सियाही वक़्त के पीले से कुछ हर्फ़
ज़िंदगी खो जाती है इन ही के दर्मियां अक़्सर

उसने परेशां कर लिया हमको बना के आईना
अपने होने का होता रहा फिर हमको गुमां अक़्सर

सुबह का वक्त ज़ेहन में धुंधला देता है इन्हे
हर शम्मा को यही अंजाम देता है जहां अक़्सर

हम तो जिनको चाहते थे बस नज़र के शौक़ से
वो शख़्स बन जाते हैं हाय दिल-ओ-जां अक़्सर

होंठ वो हिलते नहीं हाल-ए-दिल की बात पर
आँखों से ही होते हैं ये हुस्न-ए-बयां अक़्सर

हक़ीक़त है ही कुछ ऐसी के बयां कर नहीं सकते
तन्हाई को ही करना पड़ता है राज़दां अक़्सर

रोहित जैन
24/10/2007

दिल मेरे दिल तू इतना नादान क्यों है

दिल मेरे दिल तू इतना नादान क्यों है
टूटे हुए ख़्वाबों में ये अरमान क्यों है

बिखरे जाते हैं क्यों मरासिम सारे
अब मुँह फेरे हर इन्सान क्यों है

घेर चुका ही है अब ये मुझको
फिर इतना चुप ये तूफ़ान क्यों है

इख़लास के चमन बहारों में जले हैं
ये हाथ मिलाने का एहसान क्यों है

इसको तो सुलगना चाहिये आँसुओं में
इस दिल को इतना इत्मीनान क्यों है

जब सज़ा ही लिखी है किस्मत में
दिखाने को ये इम्तिहान क्यों है

मिलने ही नहीं हैं जो कभी मुझको
मिले उन रिश्तों को उन्वान क्यों है

सबको को पता है मेरे दिल की हालत
किया जाता ये एलान क्यों है

दिखता है सब साफ़ साफ़ मुझे
फिर भी कम मेरा औसान क्यों है

जहाँ शहर हुआ करता था कभी
अब उन दिलों में कब्रिस्तान क्यों है

जो सुना सुनाया करते थे कसीदे
अब फ़ातिहों के कदरदान क्यों है

दिल से दिल मिले हुए थे कभी
इतना फ़ासला अब दर्मियान क्यों है

यूँ तो हर दर्द का इलाज मिलता है
मेरे ही दर्द का नहीं दरमान क्यों है

पहले तो आँखों से ही समझ लेते थे
अब चाहिये ये तर्जुमान क्यों है

दूर दूर तक कोई नहीं आएगा
दिल को होता फिर गुमान क्यों है

मेहराबों से सजे सारे दामन हैं
खाली हमारा ही गुलदान क्यों है

सूखा होता तो शायद बेहतर था
काँटों से भरा गुलसितान क्यों है

कोई उम्मीद् की सहर मिले सेहरा में
मिलता नहीं नख़लिस्तान क्यों है

ग़ैबदान है, जो सब जानता है
‘रोहित’ पे ही नहीं मेहरबान क्यों है

28-4-2004
रोहित जैन

उन्वान == Definitions / Titles
औसान == Understanding
दरमान == Medicine / Cure
तर्जुमान == Translator
ग़ैबदान == Who knows every secret == God

तर्क़ेवफ़ा का दिल पे असर है

तर्क़ेवफ़ा का दिल पे असर है
रात कटी तो सहर का ड़र है

बड़े शौक़ से फूँक चले हो
सोच तो लेते किसी का घर है

जान भी आपके नाम लुटा दी
प्यार की कोई और कसर है

आज ज़माना मुझसे ख़फ़ा है
ये सेहरा भी आपके सर है

इतना तो बतलाते जाओ
क्या दिल मेरा राहगुज़र है

सबको पता है हाल हमारा
एक उसी को नहीं ख़बर है

मुझे पता है चुराई क्यों है
तेरी नज़र पर मेरी नज़र है

हो जो मसीहा तो ये बताओ
दिल में मेरे दर्द किधर है

ग़म में भी मुस्काते जाना
ये भी ‘रोहित’ एक हुनर है

रोहित जैन
28-07-2009

Published in: on July 30, 2009 at 10:02 am Comments (3)

2 हमरदीफ़ ग़ज़लें

हो तेरी इनायत तो मोहब्बत निभा सकूँ
दो फूल तेरी ज़ुल्फ़ में मै भी सजा सकूँ

कैसा तेरा जादू है के तेरे विसाल में
नज़दीक आ सकूँ न ही मै दूर जा सकूँ

पलकें झुका के कैसा अजब कर लिया पर्दा
ना देख सकूँ पार ना इसको उठा सकूँ

ये नहीं कहता हूँ के लौट आए गया वक़्त
इतना ही बहुत है के तुम्हे याद आ सकूँ

तू देख ले मुझको के करम ये ही बहुत है
कोसों की बात है के हालेदिल सुना सकूँ

इतनी सी दुआ मान ले ‘रोहित’ की ऐ ख़ुदा
उनको गले लगा के मै अपना बना सकूँ

————————————–
हो मेरी भी क़िस्मत के तेरे काम आ सकूँ
ऐ मेरे वतन जान भी तुझ पे लुटा सकूँ

लाखों का खून वतन की मिट्टी में लगा है
मेरा भी हो नसीब दो क़तरे गिरा सकूँ

जिन दीमकों ने खोखली कर दी तेरी बुनियाद
हो मुझ में वो हुनर के मै उनको मिटा सकूँ

तेरे सभी बच्चे जो हैं मुफ़लिस-ओ-ग़मज़दां
इतना ख़ुलूस हो के उन्हे मै हँसा सकूँ

कर दे अता ‘रोहित’ को ख़ुदा इतनी सी तौफ़ीक़
हर शख़्स को वतन के मै अपना बना सकूँ

Published in: on July 24, 2009 at 12:58 am Comments (5)

कोई होता नहीं है जान, जान कहने से

कोई होता नहीं है जान, जान कहने से
ज़मीं ज़मीं ही रही आसमान कहने से

झुलस तो अब भी रहा है मेरा ये जिस्म हुज़ूर
धूप बदली कहाँ है सायबान* कहने से — छाँव देने वाला

न रहो तुम मुग़ालते* में, कुछ नहीं हासिल — गलतफ़हमी
किसी सेहरा को यहाँ गुलसितान कहने से

न मिला चैन ना पनाह ना खुशी ही मिली
किसी खंड़हर को यां अपना मकान कहने से

वो मुझ से दूर ही था और दूर ही वो रहा
कोई फ़रक़ न था दिल की ज़ुबान कहने से

वो तो मिट्टी का था, मिट्टी में ही फ़ना भी हुआ
बदल गया है क्या उसको महान कहने से

सफ़र तो अब भी तेरा चल रहा है पहले सा
नहीं रुकता कोई रोकर थकान कहने से

वो अब भी लड़ रहे हैं तेरे मेरे मज़हब पर
कोई समझा नहीं गीता क़ुरान कहने से

वही ‘रोहित’ वही ग़म और ज़िंदगी भी वही
कहाँ बदला ज़रा वो शादमान* कहने से — खुश

रोहित जैन
12-07-2009

Published in: on July 19, 2009 at 3:50 pm Comments (6)

सोचा नहीं था दोस्त

ऐसा भी मोड़ आएगा सोचा नहीं था दोस्त
तू भी मुझे रुलाएगा सोचा नहीं था दोस्त

रक्खेगा तू ख़याल जो दिल दे दिया तुझे
दिल टूट मगर जाएगा सोचा नहीं था दोस्त

मुझको जहां समझ न सका और हँसा किया
तू भी हँसी उड़ाएगा सोचा नहीं था दोस्त

शिकवा है ज़माने को मेरे आँसुओं के साथ
तू भी न समझ पाएगा सोचा नहीं था दोस्त

ये तो खबर मुझे थी हमेशा नहीं कोई
तू छोड़ के यूँ जाएगा सोचा नहीं था दोस्त

जब लग रहा था ज़ख़्म मेरे भर से गये हैं
इक ज़ख़्म नया आएगा सोचा नहीं था दोस्त

हद से बढ़े तो प्यार बुरा हाल करेगा
हर पल हमें सताएगा सोचा नहीं था दोस्त

कोशिश हज़ार बार की ‘रोहित’ ने मौत की
कम्बख़्त मर न पाएगा सोचा नहीं था दोस्त

रोहित जैन
06-07-2009

Published in: on July 8, 2009 at 11:13 pm Comments (1)

एक ख़ास दोस्त के लिये…

एक पुराने दोस्त की बहुत याद आ रही थी ज़िंदगी ने जिससे जुदा कर दिया है…
तो दिल के ख़यालों को ग़ज़ल में लिख दिया…

आप सब के साथ बाँट रहा हूँ, दुआओं में याद रखियेगा…

तू कभी बिछड़ा नहीं और तू मिला भी नहीं
पर मुझे तुझसे कोई शिकवा नहीं ग़िला भी नहीं

तू भले मुझसे ख़फ़ा है और तू दूर भी है
मगर तुझसे ऐ दोस्त दिल को फ़ासिला भी नहीं

मै कैसे दिखलाऊं तुझको दिल की सच्चाई
एक अरसे से तू मुझसे गले मिला भी नहीं

वो एक वक़्त था जब दिल से दिल मिले थे यहाँ
ये एक वक़्त है बातों का सिलसिला भी नहीं

तू मुझे कुछ समझ, मुझको तो तुझसे प्यार है दोस्त
तुझ सा कोई ढ़ूंढ़ा नहीं मिला भी नहीं

मुझे पता है मुझ में लाख कमी है शायद
ये बेरुख़ी मगर दोस्ती का सिला भी नहीं

कभी कभी मुझे लगता है भूल जाऊं तुझे
मगर ये सच है भूलने का हौंसिला भी नहीं

तू खुश रहे ये दुआ तेरी कसम रोज़ करता हूँ
और अपने ग़म का मुझे अब कोई ग़िला भी नहीं

बस इक उम्मीद है तुझ को गले लगाऊं कभी
के वो एहसास मुझे फ़िर कहीं मिला भी नहीं

रोहित जैन
07-05-2009

Published in: on June 27, 2009 at 2:26 pm Comments (6)